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Saturday, October 3, 2009

विश्व पर्यावरण संकट......


आज समूचा विश्व पर्यावरण संकट से जूझ रहा है । 1970 के दशक में पर्यावरणीय विचारात्मक आन्दोलन का प्रारंभ माना जाता है । इसको लेकर हो रहे राजनीति को हरित राजनीति की संज्ञा दी गयी । पर्यावरणवाद के समर्थन में यह कहा गया कि यह विरासत की वस्तु न हो कर भावी पीढ़ी के लिये धरोहर है । पर्यावरण के प्रति जागरूक होना हमारा नैतिक कर्तव्य है । इससे मुह मोड़ के केवल आप खुद को धोखा दे सकते हैं ।

इसकी रक्षा के प्रति हमारा कर्तव्य है कि हम सजग हों । आर्थिक विकास की होड़ में हमने पर्यावरण को जितनी मात्रा में क्षति पहुंचायी है , प्राकृतिक संसाधनों का विदोहन किया है ठीक उसके समानान्तर संरक्षण के लिये किस हद तक प्रयास किया है । खनिज पदार्थों का नियोजन किये बिना अन्धाधुंध खनन के कारण जो अम्ल बहाये गये हैं जिन्होंने जल स्रोतों को पूर्णतया विषाक्त करके रख दिया है ।

नदियां यूं ही नाले में परिवर्तित हो रही हैं । कल कारखानों की चिमनियों से और मोटर गाड़ियों के धुओं से निकले हानिकारक रासायनिक पदार्थों ने जितना वायु प्रदूषण किया है वह जीव जन्तुओं और पेड़ पौधों के स्वास्थ्य के लिये कम हानिकारक है । उद्योगों से पैदा होने वाले कचरे और न्युक्लियर पावर के प्रयोग से पैदा होने वाले रेडियोधर्मी रिसाव से क्या धरती रहने योग्य बच सकेगी ?

पर्यावरणवाद ने हमेंशा से आर्थिक संवृद्धि पर मानवीय मौलिकताओं को वरीयता दी है । जिससे कि सबका ध्यान इस ओर आकृष्ट हो ही साथ ही ऐसा कार्यक्रम बनाकर निरन्तर प्रयास जिससे सरकार काभी ध्यान आकृष्ट हो सके ।

Tuesday, September 15, 2009

पर्यावरणीय जागरुकता को लेकर.......!

प्रयोग यदि सही तरीके से हो ,परिणाम खुद ब खुद रंग दिखाने लगते हैं । कुछ ऐसा ही नजारा देखने को मिला । पास के एक गांव में । एक नुक्क्ड़ नाटक के माध्यम से पर्यावरणीय जागरूकता को लेकर मंचन हो रहा था ।उसका मुख्य उद्देश्य बुन्देलखण्ड व विन्ध्य क्षेत्र में कम से कम पांच सौ करोड़ पौधों के वृक्षारोपण को ले कर था । गांव में मन्दिर के पास अपने उद्देश्यों को ले कर जन जागरूकता के प्रति किया गया प्रयास कहीं से कमतर प्रतीत नहीं हो रहा था ।

लोगों में इसकी सार्थकता का अन्दाजा इसी से लगाया जा सकता है कि हर वर्ग के लोग,बूढ़े,वयस्क,महिलाएं,बच्चे सभी अधिक संख्या में उपस्थित थे । अभिनेता अपने अभिनय से सबको लुभाये जा रहा था । हंसलोल बातों के बीच-बीच में काम की बातें इस प्रकार कह जाता था कि सभी उसकी बात से प्रभावित हो जाते थे । वृक्ष लगाने को ले कर सभी कृतसंकल्पित हो रहे थे ।

सचमुच ! यदि हमारी सरकार जितना पैसा वृक्षारोपण को ले कर खर्च कर रही है उसका सौ फीसदी सही तरीके से उपयोग में लाया जाय तो जनता उत्कृष्ठ काम देखकर बिना समझाये समझ जायेगी कि उसे अपने पर्यावरण के कितना जागरूक होना है । स्वाभाविक है अपेक्षित परिणाम सामने आने लगंगे । जब तक खुद में पारदर्शिता का आभाव रहेगा किसी और से कितना आगे आने के लिए प्रेरित कर सकेंगे ।

अरे...! ये पब्लिक है । सब जानती है ।

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